एसोचैम उ.प्र./२००८-०९/एफ-४५/२१ अप्रैल, २००९ श्री वी. एन. गर्ग, विषयः- प्रदेश में औद्योगिक विकास संबंधित बिन्दु प्रिय महोदय, यद्यपि उ०प्र० का शासन तथा प्रशासन समय-समय पर इस प्रान्त के औद्योगिक विकास की बात करता रहता है, धरातल पर कुछ नही आ पा रहा। हमारे दृष्टिकोण से निम्न कुछ बिन्दुओं पर प्रदेश के औद्योगिक विकास हित में गंभीर रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है। १. अवस्थापना सुविधाएं :- १.१ विद्युत की उपलब्धताः- विद्युत की दशा प्रान्त में बहुत खराब है। यद्यपि हर एक सरकार हमेशा यही आश्वासन देती रही है कि अगले पॉंच वर्षों में उ.प्र. विद्युत की उपलब्धता में आत्म निर्भर हो जाएगा - विद्युत की कमी (मात्रा तथा गुणवत्ता दोनो में) बराबर बढ़ती जा रही है। जो उद्यमी भारी खर्चा करके स्वतन्त्रा/औद्योगिक फीडर लगवातें हैं, उनके लिए भी विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित नही हो पाती। १.२ सड़कों की दशा बराबर खराब बनी हुई हैः- यद्यपि सरकार ने इसके लिए काफी धन आवंटित किया है तथा शायद व्यय भी हुआ है, सड़कों की दुर्दशा हम सबको मालूम है। १.३ औद्योगिक भूमि की उपलब्धताः- यू.पी.एस.आई.डी.सी. द्वारा विकसित औद्योगिक क्षेत्रों का रखरखाव बहुत खराब है - सड़कें खराब हैं, विद्युत की लाइने जर्जर है, कहीं-कहीं टेलीफोन की व्यवस्था भी ठीक नहीं है - फिर भी रखरखाव का व्यय यू.पी.एस.आई.डी.सी. तथा औद्योगिक क्षेत्र के स्थानीय निकाय/पंचायते आदि दोनो ही वसूल करते हैं। यू.पी.एस.आई.डी.सी. नये औद्योगिक क्षेत्र विकसित नही कर रहा है। १.४ वित्त की व्यवस्थाः- उद्योग विकास के लिए पूँजीगत तथा कार्यशील दोनो के लिए वित्त की आवश्यकता होती है। उ.प्र. के दोनो वित्त निगम (यू.पी.एफ.सी. तथा पिकप) स्वयं बीमार हैं। व्यापारिक बैंक्स नये उद्योगो की वाइबिल्टी से अधिक स्वयं अपने द्वारा प्रदत्त धन की वाइबिल्टी की अधिक चिंता करते हैं। फलस्वरूप कोई भी औद्योगिक इकाई यदि एकबार पटरी से उतर जाए तो उसको पुनः ठीक करने में कोइ रूचि नही लेता। यही कारण है कि ९५ प्रतिशत से अधिक बीमार घोषित इकाईयॉ पुनर्जीवन प्रदान करने लायक नही समझी जाती। १.५ Pollution Control (प्रदूषण नियंत्रण):- इकाईयाँ स्वयं अपने व्यय पर Afflluent Treatment Plants लगाने में सक्षम नही होती। हमारा यह सुझाव रहा है कि सरकार को स्वयं अथवा पीपीपी मॉडल पर कॉमन एफ्लुएण्ट ट्रीटमेंट प्लान्टस लगाने चाहिए तथा उसका व्यय भार एक सुनिश्चित आधार पर औद्योगिक इकाईयों से वसूलना चाहिए। २. उद्योग एवं निवेश नीतिः- उ.प्र. सरकार ने २००४ में उद्योग एवं निवेश नीति घोषित की थी। इसके सभी बिन्दुओं पर अमल होने के पहले ही, इसको शायद hold पर रख दिया गया है और नयी उद्योग नीति बनाने की बात की जा रही है। हमारा सुझाव है कि २००४ की नीति को ही आवश्यकतानुसार कुछ सुधारों के साथ पालन किया जाये। ३. उ.प्र. सरकार ने एक इण्डस्ट्रियल डेवलपमेण्ट काउंसिल की स्थापना की थी। इस काउंसिल ने कुछ अच्छे उद्यमियों को प्रदेश में लाने का प्रयास किया। दुर्भाग्यवश इस काउंसिल को समाप्त कर दिया गया। हमारा सुझाव है कि नए उद्यमियों के निवेश आकर्षित करने के लिए कुछ इसी तरह का एक नया काउंसिल पुनः गठित किया जाये। ४. कर प्रणालीः- हमारा चैम्बर शुरू से ही वैट प्रणाली के पक्ष में रहा है। हमें प्रसन्नता हुई थी कि उ.प्र. में भी 1 जनवरी २००८ से वैट प्रभावी हुआ। यद्यपि वैट लागू करने के पहले तत्कालीन व्यापार कर विभाग ने सभी बिन्दुओं का गहनता से अध्ययन किया था और यह आश्वासन देते रहे कि प्रदेश का वैट अन्य प्रान्तों के मुकाबले अधिक हितकारी होगा तथा विभागाधिकारी पूर्णतः उद्योग व्यापार के हित में नयी कर प्रणाली का पालन कराएंगे। दुर्भाग्य से फील्ड लेवल पर ऐसा नही है - पिछले १५ महीनों में वैट एक्ट, रूल्स तथा फोर्म्स में बहुत परिवर्तन किए गए हैं, व्यापारी उद्यमी अपने को उत्पीड़ित जैसा महसूस कर रहे हैं। कर प्रणाली के सरलीकरण के साथ-साथ इस बात की और अधिक आवश्यकता है कि फील्ड लेवल पर इसका पालन करने में व्यापारी/उद्यमियों का शोषण न किया जाय। ५. पड़ोसी प्रान्तों में उपलब्ध अधिक सुविधाएं:- पड़ोसी प्रान्तों में अधिक अच्छी सुविधाएं उपलब्ध होने के कारण हमारें प्रान्त में नए उद्यमी आने से कतराते हैं - यही नही यहाँ के विद्यमान उद्यमी भी अपनी इकाइ्रयाँ बार्डर जिलों में लगाने में अपना अधिक हित पाते है। इस बात को ध्यान में रखते हुए उ.प्र. सरकार ने एक करोड़ से अधिक निवेश करने वाली इकाईयों के लिए कुछ सुविधाएं उपलब्ध करायीं थी जिनको समाप्त कर दिया गया है। इसका पुनः अध्ययन कराने के पश्चात यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि उ.प्र. की विद्यमान इकाईयाँ तथा प्रदेश में लगने वाली नयी इकाईयाँ तुलनात्मक रूप से अपने को घाटे में न पाएं। ६. श्रम कानूनः- श्रम कानूनों को सरल बनाने की आवश्यकता है। इस विषय में कुछ प्राविधान २००४ की उद्योग एवं निवेश नीति में किए गए थे। समय-समय पर इस विषय पर हमारा चैम्बर विस्तार में अपने सुझाव देता रहा है। ७.१ एकल खिड़की प्रणालीः- यद्यपि प्रदेश में सिंगल विण्डों सिस्टम लागू की गई है - नये लगने वाले उद्योगों के मद्द हेतु - यह बहुत प्रभावी नही है। १. शासन एवं प्रशासन का रूखः- चाहे जो घोषणा होती हो, शासन एवं प्रशासन का व्यवहारिक रूख उद्योग एवं व्यापार हित में नहीं प्रतीत होता। उद्यमी ऐसा महसूस नही कर पाते कि शासन उद्योग हित में उनकी सहायता करना चाहता है। बहुत ही सीधी-साधी माँगो पर भी निर्णय नही हो पाते।
उपरोक्त सुझाव बिन्दुओं में कुछ भी नया नही है। उ.प्र. शासन और प्रशासन इन सभी बिन्दुओ से पूर्णतः अवगत है। माननीय मुख्यमंत्री जी ने भी फरवरी २००९ में अपने बजट भाषण में उपरोक्त कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं को शामिल किया था। लेकिन जब तक परिणाम धरातल पर नही आते, उद्यमियों को केवल बार-बार किए जाने वाले आश्वासनों से आकर्षति नही किया जा सकता। सही मायने में sincere and honest political will की आवश्यकता है - केवल कहने अथवा दिखाने के लिए नही - जब तक इसे व्यवहार में कार्यान्वित नही किया जायगा प्रदेश में उद्योग विकास अवरूद्ध रहेगा। हमारा चैम्बर आपको अपनी ओर से प्रदेश में उद्योग एवं निवेश को बढ़ावा देने हेतु पूर्ण सहयोग करने का आश्वासन देता है। धन्यवाद एवं आदर सहित । भवदीय, (एस० बी० अग्रवाल) |